प्रथम:-मानव जीवन का लक्ष्‍य (Goal of Human Life)

 

        वैदिक सभ्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण💖 अर्थात् भगवान् के साथ स्वयं के सम्बन्ध के साथ का अनुभव कर लेना ही जीवन की सिद्धि है।  श्रीमद्भगवद्गीता से, जिसे दिव्य विज्ञान के समस्त महाजनों द्वारा सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान के आधार के रूप में स्वीकार स्‍वीकार किया गया है, हम समझते हैं कि न केवल मनुष्य वरन् समस्त जीव भगवान् के विभिन्नांश हैं। अंश, अंशी के सेवार्थ बने हैं, जैसे मुख👄, हाथ👐, उंगलियाँ🖐, कान👂 इत्यादि सम्पूर्ण शरीर की सेवा के लिए बनाए गए हैं। हम जीवात्मा, भगवान् के विभिन्न अंश होने के कारण भगवत्सेवा करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं।

        वास्तव में हमारी स्थिति तो यह है कि हम सदैव किसी न किसी की सेवा करते रहते हैं, चाहे हमारे परिवार को अथवा देश की अथवा समाज की। यदि हमारे पास सेवा करने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसकी सेवा की जाए तो कभी-कभी हम बिल्ली या कुत्‍ता पालकर उसकी सेवा करते हैं। ये समस्त तत्‍व सिद्ध करते हैं कि हम स्वाभाविक रूप से सेवा करने के लिए ही बनाए गए हैं, तथापि अपने सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम सेवा करने पर भी हम सन्तुष्ट नहीं है। न ही वह व्यक्ति सन्तुष्ट है, जिसको हम इतनी सेवा कर रहे हैं। भौतिक स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति निराशा से परिपूर्ण है। इस निराशा का कारण यही है कि सेवा उचित ढंग से निदेशित नहीं की जा रही है। उदाहरण के लिए, यदि हम एक वृक्ष की सेवा करना चाहते हैं तो अवश्य ही हमें उसकी जड़ में जल देना होगा। यदि हम पक्षियों शाखाओं आदि पर जल डालें तो कोई लाभ नहीं होगा। यदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा की जाए तो अन्य सभी अंश स्वतः सन्तुष्ट हो जाएँगे। फलस्वरूप, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करने से समस्त कल्याणकारी कार्य तथा समाज, परिवार एवं देश की सेवा अपने आप ही हो जाती है।

       प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि वह भगवान् के साथ अपनी वास्तविक स्थिति को समझे और फिर उस सम्बन्ध के अनुसार कार्य करे। यदि ऐसा सम्भव हो जाए तो हमारा जीवन सफल हो जाता है। किन्तु कभी-कभी हम चुनौती देते हुए कहते हैं, कि "भगवान् है ही नहीं," अथवा "मैं भगवान् हूँ!" या यहाँ तक कि "मैं भगवान की परवाह नहीं करता।" परन्तु यह चुनौतीपूर्ण भाव वास्तव में हमारी रक्षा नहीं कर पाएगा। भगवान् है और प्रत्येक क्षण हम उनको देख सकते हैं। यदि हम अपने जीवन में भगवान् को देखना अस्वीकार कर दें तो ये हमारे सामने क्रूर मृत्यु के रूप में उपस्थित होंगे। हम उनको यदि एक रूप में नहीं देखना चाहते तो हम उनको दूसरे रूप में देखेंगे। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विविध रूप है क्योंकि वे समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। एक दृष्टि, से उनसे दूर भग पाना हमारे लिए सम्‍भव नहीं है।  

        यह कृष्णभावनामृत🙏 आन्दोलन न तो अन्ध धार्मिक उन्माद है और न ही कुछ आधुनिक व्यक्तियों का विद्रोह; अपितु परम भोक्ता, अद्वय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से सम्बन्धित हमारी शाश्वत आवश्यकता की पूर्ति करने का एक प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक मार्ग है कृष्णभावनामृत अर्थात् कृष्ण-भक्ति का अर्थ है भगवान् के साथ अपना नित्य सम्बन्ध स्थापित करना तथा उनके प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना। इस प्रकार, कृष्णभावनामृत हमें वर्तमान मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त कर लेने में समर्थ बनाता है।  

        हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि आत्मा के द्वारा लाखों वर्ष तक देहान्तरण पड़ेगा। हम् के चक्र में घुमने के पश्चात् यह विशेष मानव शरीर हमें प्राप्त हुआ है। पशु जैसे प्रत्येक वर्ष निम्न जीवन की तुलना में इस विशेष जीवन में, आर्थिक प्रश्न सहजता से हल हो जाते हैं। सूअर, कुत्ते, ऊँट और गधों इत्यादि की आर्थिक आवश्यकताएँ भी उतनी करने के ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी कि हमारी। परन्तु जहाँ इन पशुओं तथा अन्य प्राणियों के का पालन आर्थिक प्रश्न प्राचीन अवस्थाओं में ही हल हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर, प्रकृति के नियमों के द्वारा मनुष्य को एक सुविधाजनक जीवन व्यतीत करने की सभी सुविधाएँ दी जाती हैं।

        शूकर अथवा अन्य पशुओं की तुलना में मनुष्य को जीवन व्यतीत करने का श्रेष्ठ अवसर क्यों दिया जाता है ? किसी उच्च श्रेणी के सरकारी अधिकारी को एक साधारण क्लर्क की तुलना में अधिक सुखी जीवन व्यतीत करने को विशेष सुविधाएँ क्यों दी जाती हैं? इसका उत्तर अत्यन्त सरल है उस महत्त्वपूर्ण अधिकारी को एक सामान्य क्लर्क (लिपिक) की तुलना में अधिक दायित्व वाले कर्तव्यों का पालन करना पड़ता है। उसी प्रकार मनुष्यों का कर्तव्य पशुओं से श्रेष्ठ है, जो सदा ही अपने भूखे पेट को भरने में लगे रहते हैं। परन्तु प्रकृति के नियमों के कारण सभ्यता के आधुनिक पाशविक स्तर में पेट भरने की समस्याओं में केवल वृद्धि की है जब हम इन परिष्कृत पशुओं में से कुछ के पास पारमार्थिक जीवन व्यतीत करने का आग्रह लेकर जाते हैं तो ऐसे लोग कहते हैं कि वे केवल अपने पेट के सन्तोष के लिए ही कार्य करना चाहते हैं और उन्हें भगवान् के विषय में जिज्ञासा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोगों में कठोर परिश्रम करने की उत्कण्ठा होने पर भी बेरोजगारी तथा प्रकृति के नियमों के कारण उत्‍पन्‍न विघ्‍नों जैसे प्रश्‍न सदैव सामने खड़े रहते हैं। इतना सब होने पर भी ऐसे व्‍यक्ति भगवान को मानने की आवश्‍यकता का तिरस्‍कार करते हैं। 

        हमें यह जीवन शूकर अथवा श्वान के समान केवल कठिन परिश्रम करने के लिए नहीं, वरन् जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त करने के लिए दिया गया है। यदि हम यह चरम सिद्धि (पूर्णता) नहीं चाहते हैं, तो हमें अत्यन्त कठोर परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि प्रकृति के नियमों के द्वारा हम ऐसा करने के लिए बाध्य किए जाएँगे। कलियुग (वर्तमान युग) के अन्तिम चरण में ऐसा समय आने वाला है कि मनुष्यों को रोटी के टुकड़े मात्र के लिए गधों के समान कठोर परिश्रम करना पड़ेगा। हम देखते हैं कि इस दशा का आरम्भ पहले से ही हो चुका है। आगामी प्रत्येक वर्ष में कार्य अधिक करना पड़ेगा और उसके स्थान पर वेतन कम मिलता जाएगा। किन्तु इतना सब कुछ होने पर भी, मनुष्य पशुओं के समान कठोर परिश्रम करने के लिए नहीं बनाए गए हैं और यदि मनुष्य, मनुष्य के रूप में अपने कर्तव्य का पालन करने में असफल रहता है तो उसे प्रकृति के नियमों के द्वारा जीवन की निम्न योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य किया जाता है। भगवद्गीता बहुत ही स्पष्ट रूप से वर्णन करती है कि कैसे प्रकृति के नियम के अधीन जीवात्मा जन्म ग्रहण करता हैं एवं उसे किस प्रकार संसार में जड़ पदार्थ का उपभोग करने के लिए उपयुक्त देह तथा इन्द्रियाँ प्राप्त होती हैं।

        श्रीमद्भगवद्गीता में यह भी कहा गया है कि कुछ लोग भगवद् प्राप्ति के मार्ग में चलने का प्रयत्न तो करते हैं, परन्तु उसे पूर्ण नहीं कर पाते दूसरे शब्दों में ऐसे व्यक्ति जो कृष्ण भक्ति में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने में असफल रह जाते हैं, ऐसे असफल जीवों को आध्यात्मिक रूप से उन्नत परिवार में अथवा सम्पन्न वैश्य परिवार में जन्म लेने का अवसर दिया जाता है। यदि योग- भ्रष्ट व्यक्तियों को कुलीन परिवार में जन्म मिलता है, तो फिर उन जीवों के विषय में तो कहना ही क्या है, जो वास्तव में सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं? अतः भगवान् के धाम में जाने का प्रयास, चाहे वह आधा ही पूरा हुआ हो, अगले जीवन में उत्तम जन्म निश्चित कर देता है। आध्यात्मिक और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्‍न इन दोनों प्रकार परिवारों में मनुष्य को उस स्थान से भक्ति में आगे उन्नति करने का अवसर प्राप्त होता है जिस स्थान पर पूर्व जन्म में उसने भक्ति छोड़ी थी। उत्तम परिवार द्वारा उत्पन्न वातावरण आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि करने में सहायक होता है जो आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए अनुकूल है। श्रीमद्भगवद्गीता ऐसे सौभाग्यशाली परिवार में उत्पन्न व्यक्तियों को स्मरण दिलाती है कि उनका यह सौभाग्य, पूर्व में किये गये भक्तिपूर्ण कार्यों के कारण ही है। दुर्भाग्यवश ऐसे परिवारों में उत्पन्न बालक भी माया से भ्रमित हो जाने के कारण भगवद्गीता का अध्ययन नहीं करते। 

        सम्पन्न परिवार में प्राप्त हुआ जन्म, जीवन काल के आरम्भ से ही पर्याप्त भोजन प्राप्त करने की समस्या हल कर देता है और बाद में अन्य परिवारों की तुलना में वह व्यक्ति सरल तथा अधिक सुविधाजनक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकता है। ऐसी स्थिति प्राप्‍त करने पर, आध्‍यात्मिक साक्षात्‍कार में उन्‍नति करने का एक सुअवसर प्राप्त हो जाता है। परन्तु दुर्भाग्यवश वर्तमान कलियुग (जो यन्त्रों एवं यन्त्रों अपने व जैसे स्वाभाव वाले लोगों से परिपूर्ण है) के प्रभाव के कारण धनी परिवार की सन्तानें विषय-भोग की ओर मार्गभ्रष्ट हो जाती हैं और आध्यात्मिक प्रकाश के लिए प्राप्त हुए इस अवसर को वे भूल जाते हैं। अतएव प्रकृति अपने नियमों के माध्यम से इन सुनहरे घरों में आग लगा रही है। असुर रावण की सोने की लंका ही तो थी भस्म कर दी गई। प्रकृति का यही नियम है।

        श्रीमद्भगवद्गीता कृष्णभावनामृत के दिव्य विज्ञान का प्रारम्भिक अध्‍ययन है और सभी उत्तरदायी राष्ट्राध्यक्षों का यह कर्तव्य है कि वे अपने आर्थिक एवं अन्‍य कार्यक्रमों की रूपरेखा भगवद्गीता के आधार पर बनाएँ। हम जीवन के आर्थिक प्रश्नों को एक अस्थिर स्तर पर सन्तुलित करने के लिए नहीं है, वरन् हम प्रकृति के नियमों से उत्पन्न होने वाली जीवन की चरम समस्याओं को हल करने के लिए बनाए गए हैं। वह सभ्यता निष्क्रिय है, जिसमें आध्यात्मिक आन्दोलन के लिए कोई स्थान नहीं है। आत्मा शरीर को चलाती है और चेतनायुक्त शरीर से विश्वचलायमान है। हम देह के विषय में तो चिन्तित हैं, परन्तु हमें उस आत्मा का कोई ज्ञान ही नहीं है, जो इस देह को चला रहा है। आत्मा के बिना शरीर निष्क्रिय या मृत है।

        यह मानव शरीर एक उत्तम वाहन है जिसके द्वारा हम साश्वत जीवन तक पहुँच सकते हैं। यह अज्ञान रूपी भवबंधन के सागर को पार करने के लिए एक दुर्लभ एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नाव है। इस नाव पर एक कुशल नाविक के रूप में आध्यात्मिक गुरु की सेवा मिलती है। दिव्य कृपा के द्वारा नाव, जल के ऊपर अनुकूल दिशा में चलती है। इन सब मंगलमय साधनों के मिल जाने पर ऐसा कौन व्यक्ति होगा, जो अज्ञान के सागर को इस अवसर का लाभ न उठाए ? यदि कोई इस सुन्दर अवसर की उपेक्षा करता है तो यह जानना चाहिए कि वह मात्र आत्महत्या कर रहा है।

        निश्चय ही रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में प्रचुर सुविधाएँ रहती हैं, परन्तु रेलगाड़ी अपने गन्तव्य की ओर यदि न बढ़े, तो उस वातानुकूलित डिब्बे का लाभ ही क्या है? आजकल की सभ्यता इस भौतिक शरीर को अधिकाधिक सुविधा प्रदान करने के लिए अत्यन्त चिन्तित है। किसी को भी जीवन के वास्तव गन्तव्य की. अर्थात् भगवद्धाम लौटने कि जानकारी नहीं हैं। हमें एक सुविधाजनक डिब्बे में केवल बैठे ही नहीं रहना चाहिए, वरन् यह भी देखना चाहिए कि हमारा वाहन अपने वास्तविक गन्तव्य की ओर बढ़ भी रहा है अथवा नहीं। यदि हम जीवन की प्राथमिक आवश्यकता अर्थात् अपने खोए हुए आध्यात्मिक स्वरूप की पुनः प्राप्ति को भूल कर केवल अपने भौतिक शरीर को सुखसुविधा देते रहें तो इससे परम लाभ न हो सकेगा। मानव जीवन रूपी नाव की रचना ही इस प्रकार हुई है कि इसे परमार्थिक गन्तव्य की ओर अवश्य बढ़ाना चाहिए। दुर्भाग्य से यह शरीर भौतिक चेतना की पाँच प्रबल श्रृंखलाओं से बँधा हुआ है : (१) आध्यात्मिक तथ्यों की अज्ञानता के कारण इस भौतिक देह के प्रति आसक्ति रखना, (२) शरीर का सम्बन्ध होने के कारण स्वजनों में आसक्ति रखना, (३) जन्मभूमि तथा घर, घर की वस्तुएँ, भूमि, सम्पत्ति, व्यापारिक कागजात इत्यादि जैसी भौतिक सम्पत्ति के प्रति आसक्ति रखना, (४) भौतिक विज्ञान के प्रति आसक्ति रखना, जो सदा ही आध्यात्मिक प्रकाश के अभाव के कारण रहस्यमय बना रहता है और (५) पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् तथा उनके भक्तों को जाने बिना ही धार्मिक रीतियों एवं अनुष्ठानों में आसक्ति रखना, यह जाने बिना कि भगवान् एवं उनके भक्तों की उपस्थिति के कारण ही ये सब पवित्र होते हैं। भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में मानव शरीर रूपी नाव को बाँधे रखने वाली इन आसक्तियों की विस्तार से व्याख्या की गई है। वहॉं इन आसक्ति-रूपी श्रृंखलाओं की तुलना गहरी जड़ों वाले एक वट के वृक्ष से की गई है जो अपनी दृढ़ स्थिति को भूमि के साथ नित्‍य ही बढ़ाता जाता है। ऐसे बलवान् वट वृक्ष को उखाड़ फेंकना अत्यधिक कठिन है, परन्तु भगवान् इसके लिए निम्नलिखित विधि की संस्तुति करते हैं, "इस वृक्ष के मूल रूप की प्रतीति इस संसार में नहीं हो सकती। इसके आदि, अन्त अथवा आधार को भी कोई नहीं जान सकता। परन्तु इस वृक्ष को दृढ़ निश्चय के साथ वैराग्य रूपी शस्त्र के द्वारा काट कर, फिर उस स्थान को खोजना चाहिए, जिसे प्राप्त होकर संसार में पुनः नहीं आना पड़ता। वहॉं उस परमधाम में पूर्ण पुरूषोत्‍तम भगवान् की शरण लेनी चाहीए, जिनसे प्रत्‍येक वस्‍तु का आरम्‍भ हुआ है और जिनमें अनादि काल से प्रत्येक वस्तु निवास कर रही है।" (गीता १५.३-४)

न तो वैज्ञानिक और न ही मनोकल्पना करने वाले दार्शनिक, ब्रह्माण्ड की स्थिति के सम्बन्ध में अभी तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने में सफल हुए हैं। उन्होंने अब तक इस सम्बन्ध में केवल विभिन्न सिद्धान्तों की स्थापना ही की है। उनमें से कुछ कहते हैं कि भौतिक संसार सत्य है, कुछ कहते हैं कि यह एक स्वप्न है और कुछ यह भी कहते हैं कि यह नित्‍य है। इस प्रकार भौतिकतावादी विद्वानों के विभिन्‍न मत हैं। परन्‍तु तथ्‍य तो यह है कि ब्रह्माण्‍ड के आरम्‍भ या इसकी सीमाओं की किसी भी प्राककृत वैज्ञानिक या परिकल्‍पी दार्शनिक के द्वारा खोज नहीं की गई है। कोई भी यह नहीं कह सकता कि ब्रह्माण्‍ड का आरम्‍भ कब हुआ अथवा यह अन्‍तरिक्ष में किस प्रकार से तैर रहा है। वे सिद्धान्‍त की दृष्टि से कुछ नियमों का प्रस्‍ताव रखते हैं जैसे गुरूत्‍वाकर्षण का नियम, परन्‍तु वास्‍तव में वे इस नियम का कोई व्‍यावहारिक उपयोग नहीं कर सकते । सत्‍य के वास्‍तविक ज्ञान के अभाव के कारण ही प्रत्‍येक व्‍यक्ति कुछ प्रसिद्धि पाने के उद्देश्‍य से अपने सिद्धान्‍त को आगे बढ़ाने के लिए उत्‍सुक रहता है। परन्‍तु वास्‍तविकता तो यह है कि यह संसार दु:खों से भरा पड़ा है और कोई भी व्‍यक्ति इस विषय पर कुछ सिद्धन्‍त प्रस्‍तुत करने मात्र से इन दु:खों के ऊपर विजय नहीं प्राप्‍त कर सकता। पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान्, जिन्‍हें सृष्टि की प्रत्‍येक वस्‍तु का पूर्ण रूप से ज्ञान है, हमें जानकारी देते हैं कि हमारा परम कल्‍याण इसी में है कि हम इस दु:खमय स्थिति से मुक्ति पाने की इच्‍छा करें। हमें सभी भैतिक वस्‍तुओं से अनासक्‍त होना है। इस खराब सौदे का सबसे अच्‍छा उपयोग करने के लिए यह परमावश्‍यक है कि हमारा भौतिकजीवन शत-प्रतिशत आध्‍यात्मिकृत कर दिया जाए। लोहा अग्नि नहीं है, परन्‍तु अग्नि के निरत्न्‍तर सम्‍पर्क में रखने पर इसे भी अग्नि में परिवर्तित किया जा सकता। उसी प्रकार भैतिक क्रियाओं के प्रति अपनी अनासक्ति को आध्‍यात्मिक कर्मों में संलग्‍न रखने से प्रभावशाली बनाया जा सकता है, भौतिक रूप से जड़ बन जाने के द्वारा नहीं। भौतिक जड़ता भौतिक कार्यों का एक नकारात्‍मक पक्ष है, परन्‍तु आध्‍यात्मिक कर्म न केवल भौतिक कार्यों को रोक देते हैं, वरन् हमें वास्‍तविक जीवन के कार्यों क प्रति क्रियाशील भी कर देते हैं। हमें परब्रह्म में अपने शाश्वत जीवन अर्थात् आध्‍यात्मिक आस्तित्‍व की खोज करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में परब्रह्म के उस शाश्वत धामका वर्णन इस प्रकार किया गया है कि यह वह नित्‍य लोक है जहॉं चले जाने पर फिर कोई वहॉं से वापस नहीं लौटता। भगवान् का धाम तो यही है।

        हमारा वर्तमान सांसारिक जीवन कब आरम्‍भ हुआ इसकी खोज नहीं की जा सकती और न ही हमारे लिए यह जानना आवश्‍यक है कि हम इस संसार से किस प्रकार बँध गए। हमें केवल इतना जानने से सन्‍तुष्‍ट होना पड़ेगा कि किसी न किसी प्रकार से यह सांसारिक जीवन अनादि काल से चल रहा है और अब हमारा कर्त्तव्‍य परम-ईश्वर की शरण लेना है, जो सब कारणों के आदि कारण हैं। भगवद्गीता में भगवान् के धाम में लौटने की प्राथमिक योग्‍यता के विषय पर जानकारी दी गई है, ‘’जो माह, मिथ्‍या मान और झूठी संगति से मुक्त हैं, जो नित्‍य को समझते है जिनकी सम्‍पूर्ण भौतिक कामनाएँ नष्‍ट हो चुकी हैं, जो सुख-दु:ख के द्वन्‍द्वों से मुक्त हैं और उन परम पुरूष की शरण लेना जानते हैं, वे उस अविनाशी नित्‍य धाम को प्रापत होते हैं।‘’

        ऐसा व्‍यक्ति जिसे अपने स्‍वरूप के आध्‍यात्मिक होने का विश्वास है तथा जो अस्तित्‍व की भौतिक धारणा से मुक्त है, जो मोह से मुक्त है तथा भौतिक प्रकृति से परे है, जो आध्‍यात्मिक ज्ञान की प्राप्‍ती के सदैव प्रयास रत है तथा जिसने इन्द्रिय भोग से स्‍वयं को पूर्णतया विलग कर लिया है, वही भगवान् के पास लौट सकता है। ऐसे व्‍यक्ति को अमूढ़ कहते हैं। अमूढ़ मूढ़ अर्थात् मूर्ख तथा अज्ञानी से भिन्‍न है क्‍योंकि वह सुख तथा दु:ख के द्वन्‍द्व से मुक्त है।

        भगवान के धाम का स्वरूप कैसा है ? इसका वर्णन भगवद्गीता (१५.६) में इस प्रकार हुआ है, "मेरा वह धाम न सूर्य, न चन्द्रमा और न बिजली द्वारा प्रकाशित होता है। उसे प्राप्त करने वाला पुनः इस संसार में नहीं आता।" यद्यपि इस सृष्टि का प्रत्येक स्थान भगवान के साम्राज्य के भीतर ही है, क्योंकि भगवान् ही समस्त लोकों के परम स्वामी हैं तथापि भगवान् का एक व्यक्तिगत धाम है। वह लोक परमम् अथवा परम धाम कहलाता है। जिस ब्रह्माण्ड में हम अभी निवास कर रहे हैं, वह उस "परम धाम" से पूर्ण रूप से भिन्न है। इस पृथ्वी पर भी कई देश है जहाँ जीवन का स्तर उच्च है और कुछ देश ऐसे हैं जहाँ स्तर निम्न है। पृथ्वी के अतिरिक्त भी इस ब्रह्माण्ड में असंख्य अन्य लोक बिखरे पड़े हैं। उनमें से कुछ इस पृथ्वी से श्रेष्ठ समझे जाते हैं तथा कुछ निम्न स्तर के माने जाते हैं। कुछ भी हो, इस ब्रह्माण्ड के सभी लोकों को आस्तित्ववान रहने के लिए सूर्य अथवा अग्नि के प्रकाश की आवश्यकता होती है, क्योंकि भौतिक ब्रह्माण्ड अन्धकार के क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र के परे एक आध्यात्मिक जगत है, जो भगवान् की श्रेष्ठ (परा) प्रकृति के द्वारा क्रियाशील कहा जाता है। उस क्षेत्र का उपनिषदों में इस प्रकार वर्णन किया गया है, "वहाँ सूर्य, चन्द्रमा अथवा तारों की आवश्यकता नहीं है और न ही वह धाम बिजली अथवा अग्नि के किसी रूप से प्रकाशित होता है। ये सभी भौतिक ब्रह्माण्ड उस दिव्य प्रकाश के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित हैं; क्योंकि वहां पर प्रकृति सदैव स्वयं प्रकाशित है, अतः हम रात्रि के गहनतम् अन्धकार में भी मन्द प्रकाश का अनुभव कर सकते है।‘’ हरिवंश नामक ग्रंथ में पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् ने स्वयं अपनी परा (अप्राकृत) प्रकृति का इस प्रकार वर्णन किया है, "निर्विशेष (निराकार) ब्रह्म का देदीप्यमान् प्रकाश भौतिक जगत् एवं आध्यात्मिक जगत दोनों को ही प्रकाशित करता है। परन्तु हे भारत! तुम यह निश्चय ही समझ लो कि यह ब्रह्म प्रकाश मेरे शरीर की कान्ति है।" इस निष्कर्ष को ब्रह्मसंहिता में भी प्रमाणित किया गया है। हम यह न सोचें कि हम उस परम धाम को अन्तरिक्षयान जैसे किसी भी भौतिक साधन के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु हमें यह निश्चित ही जानना चाहिए कि जो भी आध्यात्मिक कृष्ण-लोक को प्राप्त करता है, वह आध्यात्मिक आनन्द का निरन्तर रसास्वादन कर सकता है। अधोन्मुख जीव होने के कारण, हमारे अस्तित्व के दो पक्ष हैं। एक भौतिक अस्तित्व, जो जन्म, मृत्यु जरा और व्याधि के दुःखों से पूर्ण है और दूसरा आध्यात्मिक अस्तित्व है जिसमें निर्वाध आध्यात्मिक जीवन की प्राप्ति होती है जो शाश्वत्ता, आनन्द तथा ज्ञान से परिपूर्ण है। भौतिक अस्तित्व में हम देह एवं मन की भौतिक धारणा द्वारा शासित किए जाते हैं, किन्तु आध्यात्मिक अस्तित्व में हम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के परमानन्दमय दिव्य सम्पर्क का सदैव रसास्वादन कर सकते हैं। आध्यात्मिक अस्तित्व में भगवान् हमारी दृष्टि से कभी भी ओझल नहीं होते।

कृष्णभावनामृत आन्दोलन समस्त मानव जाति को उस आध्यात्मिक अस्तित्व पर लाने का प्रयास कर रहा है। हम अपनी वर्तमान भौतिक चेतना के कारण जीवन की विषयासक्त भौतिक धारणाओं में आसक्त हैं। परन्तु कृष्ण की भक्तिमय सेवा मे अर्थात् कृष्णभावनामृत के द्वारा वह धारणा तत्काल ही दूर की जा सकती है। यदि हम भक्तिमय सेवा के सिद्धान्तों को अपना लें, तो जीवन की भौतिक धारणाओं से परे जा सकते हैं और विविध भौतिक कार्य-कलापों में संलग्न होने पर भी हम सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से मुक्त रह सकते हैं। भौतिक कार्यों में लिप्त कोई भी व्यक्ति 'बैक टु गॉडहेड' तथा इस कृष्णभावनामृत अभियान के अन्य साहित्य के द्वारा परम लाभ प्राप्त कर सकता है। ये ग्रन्थ, संसार रूपी वट के दुर्जेय की जड़ों को छिन्न-भिन्न करने में लोगों की सहायता करते हैं। ये प्रामाणिक साहित्य हमें जीवन की भौतिक धारणा से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु का त्याग एवं पग-पग पर आध्यात्मिक रसामृत का आस्वादन करने का प्रशिक्षण देते हैं। यह अवस्था केवल भक्तिमय सेवा से प्राप्त की जा सकती है और अन्य किसी भी साधन से नहीं। ऐसी सेवा के द्वारा इस वर्तमान जीवन में ही तत्काल मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। अधिकांश आध्यात्मिक प्रयासों में भी भौतिकतावाद का पुट लगा रहता है, परन्तु विशुद्ध भक्तिमय सेवा भौतिक कलुष से परे है। जिनको भगवान् के पास लौटने की कामना है उनके लिए केवल इतना आवश्यक ही है कि वे इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सिद्धान्तों का पालन करें तथा अपनी चेतना को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्द पर केन्द्रित करें।

      

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